बढ़े चलें ( कविता )
बढ़े चलें हम, बढ़े चलें हम
नई किताबें पढ़े चलें हम,
हम भविष्य को सुखद बनाएं
समय नहीं बेकार गंवाएं
सफल बनाएं जीवन अपना
हो पूरा उन्नति का सपना
प्रेम देश से सदा करें हम
नहीं किसी से कभी डरें हम
यदि पढ़-लिख विद्वान बनेंगे
यदि पढ़-लिख गुणवान बनेंगे
सभी हमारा मान करेंगे
हममें नव उत्साह भरेंगे।
⋗ कविता
- विनोद चंद्र पाण्डेय
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